Monday, September 7, 2009

जब तक जिये, खुशि से जी

जब तक जिये, खुशि से जी;
जिन्दादिली हि जिन्दगी.
मन मै तेरे तू क्यो छिपाए,
कर तू वही, जो दिल को भाए;
डरना नही, करना वही;
उचित हो, अनुचित नही;
यही शिक्षा पुराणों ने दी...... जब तक जिये, खुशि से जी;
जिन्दादिली हि जिन्दगी.
पीना हि है तो--
भक्ति-रस जी भर के पी;
रब ने जिन्दगी,
इसलिये ही तो दी;
जब तक जिये, खुशि से जी;
जिन्दादिली हि जिन्दगी.

बोलना हि है, तो दिल खोल के बोल,
कोइ सुने ना सुने; पीटे जा ढोल,
पोल चाहे खोल, सारी दुनिया है गोल;
सचाइ बिके यहां, मिट्टी के मोल;
इसलिये..
चिन्ता तू छोड; आ मस्ति में जी,
. उधारी का घी,
जी भर के पी,
जब तक जिये, खुशि से जी
जिन्दादिली हि जिन्दगी
झूमना हि है तो मस्ति मे झूम,
चारो` तरफ मचा दे धूम;
गाने मे` क्या?
ग गा...गि...गी....
सा....रे....गम...पद....नि...सा...
सा....नि....द...प....म.....ग..रे...सा....
सा..रे..गम..पद..तले..
नाचे` गाये` चलो चले`
हंसने में क़्या?
ह..हा..हि..ही....
करना नहि` कभी कन्जूसी;
जब तक जिये, खुशि से जी
जिन्दादिली हि जिन्दगी.

4 comments:

  1. सरजी ।मेरी सर्विस गुना मे ही थी और वही से रिटायर हुआ हूं ।आज आपको कवि के रूप में जानक्रर बहुत प्रसन्नता हुई ।भाव प्रधान कविता=उचित हो वही करना , पीना है तो भक्ति रस पीना ,जब तक जिये खुशी से जीना ।
    आपके सारे ब्लोग देखे नवम्बर के बाद आपने किसी भी ब्लोग पर कुण्छ नया नही लिखा है ।

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  2. झूमना हि है तो मस्ति मे झूम,
    चारो` तरफ मचा दे धूम;
    गाने मे` क्या?
    ग गा...गि...गी....
    सा....रे....गम...पद....नि...सा...
    सा....नि....द...प....म.....ग..रे...सा....
    सा..रे..गम..पद..तले..
    नाचे` गाये` चलो चले`

    Wah kya baat hai sirji

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